धर्म की परिभाषा
दुनिया भर के विभिन्न पंथों, संप्रदायों ने धर्म को अलग-अलग शब्दों में परिभाषित किया है। फिर भी विभिन्न पंथों, संप्रदायों और विद्वानों के मुताबिक धर्म की सर्वमान्य परिभाषा तैयार की गई है। विभिन्न शब्दकोश में दिए अर्थ के अनुसार \'धर्म\' शब्द का अर्थ है - किसी वस्तु या व्यक्ति में सदा रहने वाली उसकी मूल वृत्ति, प्रकृति, स्वभाव, मूल गुण। एक अन्य शब्दकोश के अनुसार धर्म का अर्थ है - ईश्वर के प्रति मनुष्य का कर्तव्य। स्पष्टत: यह शब्द संस्कृत की \'धृ\' धातु से बना है, जिसका तात्पर्य है धारण करना, आलंबन देना, पालन करना।
विद्वानों का मत है कि धर्म वह है जो हमें आदर्श जीवन जीने की कला और मार्ग बताता है। केवल पूजा-पाठ या कर्मकांड ही धर्म नहीं है। धर्म मानव जीवन को एक दिशा देता है। विभिन्न पंथों, मतों और संप्रदायों द्वारा जो नियम, मनुष्य को अच्छे जीवन यापन, जिसमें सबके लिए प्रेम, करूणा, अहिंसा, क्षमा और अपनत्व का भाव हो, ऐसे सभी नियम धर्म के तहत माने गए हैं। दुनिया के सभी प्रमुख धर्मों का सार लगभग एक ही है। सभी धर्म करूणा, दया, प्रेम, अहिंसा, कर्म, सत्य और अपरिग्रह जैसे नियमों से ही जुड़े हैं। धर्म वह है जो हमारे जीवन में आदर्श अनुशासन लाता है। आदर्श अनुशासन वह जिसमें व्यक्ति की विचारधारा और जीवनशैली सकारात्मक हो जाती है। जब तक किसी भी व्यक्ति की सोच सकारात्मक नहीं होगी, धर्म उसे प्राप्त नहीं हो सकता है।
ईश्वर एक तो धर्म भी एक
विभिन्न धर्म शास्त्रों ने, विद्वानों ने धर्म को अपनी विचारधारा के अनुसार परिभाषित किया है। किसी ने दया, करूणा और प्रेम को धर्म बताया है तो किसी ने अहिंसा को लेकिन वेदों और पुराणों ने धर्म को विस्तार पूर्वक समझाया है। वेदों के मुताबिक धर्म में उत्तम आचरण के निश्चित और व्यवहारिक नियम हैं।
1. ''आ प्रा रजांसि दिव्यानि पार्थिवा श्लोकं देव: कृणुते स्वाय धर्मणे। (ऋग्वेद - 4.5.3.3)
''धर्मणा मित्रावरुणा विपश्चिता व्रता रक्षेते असुरस्य मायया। (ऋग्वेद - 5.63.7)
यहाँ पर 'धर्म का अर्थ निश्चित नियम (व्यवस्था या सिद्धांत) या आचार नियम है।
2. अभयं सत्वसशुद्धिज्ञार्नयोगव्यवस्थिति:। दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाधायायस्तप आर्जवम्।।
अहिंसा सत्यमक्रोधत्याग: शांतिर पैशुनम्। दया भूतष्य लोलुप्तवं मार्दवं ह्रीरचापलम्।।
3. तेज: क्षमा धृति: शौचमद्रोहो नातिमानिता। भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत।। (गीता : 16/1, 2, 3)
यानि भय रहित मन की निर्मलता, दृढ़ मानसिकता, स्वार्थरहित दान, इंद्रियों पर नियंत्रण, देवता और गुरुजनों की पूजा, यश जैसे उत्तम कार्य, वेद शास्त्रों का अभ्यास, भगवान के नाम और गुणों का कीर्तन, स्वधर्म पालन के लिए कष्ट सहना, सरल, व्यक्तित्व, मन, वाणी तथा शरीर से किसी को कष्ट न देना, सच्ची और प्रिय वाणी, किसी भी स्थिति में क्रोध न करना, अभिमान का त्याग, मन पर नियंत्रण, निंदा न करना, सबके प्रति दया, कोमलता, समाज और शास्त्रों के अनुरूप-आचरण, तेज, क्षमा, धैर्य, पवित्रता, शत्रुभाव नहीं रखना - यह सब धर्म सम्मत गुण व्यक्तित्व को देवता बना देते हैं।धर्म का मर्म और उसकी व्यापकता को स्पष्ट करते हुए गंगापुत्र भीष्म कहते हैं -
4. सर्वत्र विहितो धर्म: स्वग्र्य: सत्यफलं तप:।बहुद्वारस्य धर्मस्य नेहास्ति विफला क्रिया।। (महाभारत शांतिपर्व - 174/2)
यानि धर्म अदृश्य फल देने वाला होता है। जब हम धर्ममय आचरण करते हैं, तो चाहे हमें उसका फल तत्काल दिखाई नहीं दे, किंतु समय आने पर उसका प्रभाव सामने आता है। सत्य को जानने (तप) का फल, मरण के पूर्व (ज्ञान रूप में) मिलता है। जब हम धर्म आचरण करते हैं तो कठिनाइयों का सामना भी करना पड़ता है।किंतु ये कठिनाइयाँ हमारे ज्ञान और समझ को बढ़ाती हैं। धर्म के कई द्वार हैं। जिनसे वह अपनी अभिव्यक्ति करता है। धर्ममय आचरण करने पर धर्म का स्वरूप हमें समझ में आने लगता है, तब हम अपने कर्मों को ध्यान से देखते हैं और अधर्म से बचते हैं। धर्म की कोई भी क्रिया विफल नहीं होती, धर्म का कोई भी अनुष्ठान व्यर्थ नहीं जाता। महाभारत के इस उपदेश पर हमेशा विश्वास करना चाहिए और सदैव धर्म का आचरण करना चाहिए।
5. यस्मिंस्तु सर्वे स्यरसंनिविष्टा धर्मो यत: स्यात् तदुपरक्रमेता।
द्वेष्यो भवत्यर्थपरो हि लोके कामत्मता खल्वपि न प्रशस्ता।। (वाल्मीकि रामायण 2/21/58)
यानि जिस कर्म में धर्म आदि पुरुषार्थ शामिल न हो उसको नहीं करना चाहिए। जिससे धर्म की सिद्धि होती हो, वही कार्य करें। जो केवल धन कमाने के लिए कार्य करता है, वह संसार में सबके द्वेष का पात्र बन जाता है। धर्म विरुद्ध कार्य करना प्रशंसा नहीं निंदा की बात है।
वास्तविक और पूर्ण धर्म तो वह है जो
जीवन में जो व्यवहार और कर्म अपनाने योग्य है या धारण करने लायक है वही धर्म है। धर्म मनुष्य को उचित-अनुचित का अंतर समझाता है। कैसे कर्म करना उचित है और किस प्रकार के कर्म करना अनुचित है गलत है। इस बात का ज्ञान हमें धर्म से प्राप्त होता है। जन्म के समय प्रत्येक मनुष्य पशु के समान ही होता है। कुछ समझदार होने पर धर्म के मार्ग पर चलकर ही मनुष्य सच्चा मनुष्य बतना है। लोगों में यह गलत मान्यता है कि किसी विशेष प्रकार के रीति-निवाज, पूजा-पाठ, कर्मकांड और वेश-भूषा अपनाना ही धर्म की पहचान हे। वास्तविक, सच्चा और पूर्ण धर्म तो वह जो संसार के सभी मनुष्यों पर समान रूप से लागू होता है। इसीलिए धर्म को सर्वव्यापी और सर्वकालिक माना गया है। जिसे लोग हिंदू धर्म, मुस्लिम धर्म, ईसाई धर्म, सिक्ख धर्म, पारसी धर्म, यहूदी धर्म आदि नामों से जानते हैं। ये सभी ईश्वर तक पहुंचने के अलग-अलग मार्ग या तरीके हैं। हिंदू, इस्लाम, सिक्ख, ईसाई आदि को धर्म की बजाए संप्रदाय कहना अधिक उचित है और तर्कसंगत है। पूर्ण धर्म तो वही हो सकता है जो सभी मनुष्यों को उचित आचरण और व्यवहार सिखाता है। धर्म ही मनुष्य को जीवन जीने की कला (आर्ट ऑफ लिविंग) सिखाता है। धर्म ही यह बताया है कि जीवन का उद्देश्य क्या? धर्म ही सिखाता है कि मनुष्य का आचरण कैसा होना चाहिए? ध्र्मा ही यह सिखाता है कि सच्चा और उत्तम मनुष्य कैसा होना चाहिए। धर्म ही यह सिखाता है कि मनुष्य का पूर्ण विकास कैसे हो सकता है? धर्म ही मनुष्य की शक्ति है धर्म ही मनुष्य सच्चा शिक्षक। धर्म के बिना मनुष्य अधूरा है।
संतों, महापुरुषों एवं विद्वानों के द्वारा दी गई परिभाषाएं
धर्म मनुष्य के चिन्तन और जीवन का सबसे उच्च स्तर है। विद्वानों ने अपने-अपने विश्लेषण और अध्ययन के आधार पर धर्म को शब्दों में बांधा है। पौराणिक काल से आधुनिक काल तक हर काल में धर्म के मर्म को समझने का प्रयास किया गया है।
विभिन्न विद्वानों के मुताबिक धर्म :-
धर्म अनुभूति की वस्तु है। वह मुख की बात मतवाद अथवा युक्तिमूलक कल्पना मात्र नहीं है। आत्मा की ब्रह्मस्वरूपता को जान लेना, तद्रुप हो जाना- उसका साक्षात्कार करना, यही धर्म है- वह केवल सुनने या मान लेने की चीज नहीं है। समस्त मन-प्राण का विश्वास की वस्तु के साथ एक हो जाना - यही धर्म है।
(7-8 स्वामी विवेकानंद साहित्य, संचयन पृष्ठ : 107, 121)
किसी वस्तु की विधायक आंतरिक वृत्ति को उसका धर्म कहते हैं। प्रत्येक पदार्थ का व्यक्तित्व जिस वृत्ति पर निर्भर है, वही उस पदार्थ का धर्म है।
(डॉ. राजबली पाण्डेय, हिंदू धर्मकोश पृष्ठ : 339)
वैशेशिक दर्शन ने धर्म की बड़ी सुंदर वैज्ञानिक परिभाषा दी है :
\'\'यतोऽभ्युदयानि: श्रयेसिद्धि स धर्म:।
अर्थात् धर्म वह है जिससे इस जीवन का विकास और अगले जीवन(जन्म) का सुधार हो।
\'\'वेद स्मृति: सदाचार स्तस्य च प्रियमात्मन:।
एतच्चतुर्विध प्राहू: साक्षाद्रर्मस्य लक्षणम्।।
(मनु स्मृति 2.12)
आधुनिक प्रवचनकार एवं सुप्रसिद्ध संत मानस मर्मज्ञ मोरारी बापू के अनुसार बड़ी सरल व सहज भाषा में धर्म का स्वरूप बताते हुए कहा है -जीवन का लक्ष्य है ईश्वर को पाना। धर्म वह मार्ग है जो ईश्वर तक पहुंचाता है। भारतीय सनातन परंपरा में धर्म का सर्वमान्य भाव है- जिस कर्म से सबका कल्याण हो, वह धर्म है अर्थात् हमारे वे कार्य जिनसे समस्त सृष्टि का भला होता है, वह हमारा धर्म है। दूसरे शब्दों में धर्म में रहकर हम संपूर्ण सृष्टि के मंगल की कामना करते हैं। धर्म के माध्यम से हम उस ईश्वर तक पहुंचते हैं। जो सबका मंगल करते हैं और अमंगल को दूर करते हैं।
विश्व विख्यात वैज्ञानिक आइंसटाइन के अनुसार धर्म
संसार में ज्ञान और विश्वास दो वस्तुएं हैं। ज्ञान को विज्ञान और विश्वास को धर्म कहेंगे। इस युग में लोगों की मान्यता है कि ज्ञान बड़ा है, क्योंकि यह क्रमबद्ध है, स्कूलों में इसी का शिक्षण होता है। किंतु यह मानव जीवन के उद्देश्य को बहुत देर तक प्रयोग करके भी शायद ही बता सकें, जबकि विश्वास में तार्किक चिंतन और क्रमबद्ध ज्ञान (राशनल नॉलेज) दोनों ही आधार हैं, जो हमारा संबंध सीधे परम अवस्था या अपने मूलभूत उद्देश्य से जोड़ देते हैं।
जीयो और जीने दो...
सनातन धर्म को यदि एक पंक्ति में कहना हो तो यही कहा जाएगा - जियो और जीने दो।
भारतीय सनातन परपंरा की यही विशेषता भारत को विश्व गुरु बनाती है। धर्म का यही भाव आगे चलकर विभिन्न स्वरूपों में ढलता गया और धर्माचरण के विधान बनते गए, किंतुयुग-युगांतरों में भी सनातन धर्म का शाश्वत भाव अपरिवर्तित रहा जोकि यह है :
सर्वे भवंतु सुखिन:सर्वे संतु निरामयाः
सर्वे भद्राणि पश्यंतु मा कश्चिद्दु:ख भागभवेत।
सबके भले की कामना करने वाला दुनिया का एक मात्र धर्म सनातन धर्म ही है। वैदिक युग में (ऋग्वेद 10/90/16) यज्ञ को धर्म कहा गया है। यज्ञ का विधान संपूर्ण सृष्टि के कल्याण के लिए किया गया। वेदों के मंत्र हमें सिखाते हैं कि विश्व का कल्याण कैसे हो। वैदिक काल के बाद उपनिषद्काल में (कठोपनिषद् 1/2/14) कहा गया कि शास्त्रीय अनुष्ठान धर्म है। यानि वेदों में जो कहा गया है, वही धर्म है। मनुस्मृति (2/12)कहती है कि वेद, धर्मशास्त्र, सदाचार और आत्मसंतुष्टि धर्म के साक्षात लक्षण हैं। यानि वेद और शास्त्रों की वाणी का पालन करना, ऐसा आचरण करना जिससे किसी को कोई नुकसान या दु:ख न पहुँचे और ऐसे कार्य करना जिससे अपनी आत्मा को संतोष मिले वे सभी कार्य धर्ममय हैं।
वेदों में निहित जीवन जीने की कला -
हम वेद शास्त्रों का अध्ययन करें तो हमें जीवन जीने का वह सर्वोत्तम तरीका, जिसे राजमार्ग भी कह सकते हैं मिल जाएगा।जो इस संसार को सुखी, समृद्ध, प्रेममय और ईश्वर मय बनाता है, किंतु आवश्यकता इस बात की है कि धर्म शास्त्रों में निहित उस अनुभव सिद्ध, प्रामाणिक एवं उच्चतर ज्ञान को गहराई से समझें और समझने के साथ-साथ जीवन में अपनाएं।क्योंकि पढऩे कीअपेक्षा समझना, समझने की अपेक्षा उस पर गहन चिंतन करना और चिंतन करने से भी उसे आचरण में उतारना अधिक महत्वपूर्ण है।
आचरण में उतारे बिना धर्म का ज्ञान भी निष्प्राण या बेजान बनकर रह जाता है। धर्म जब जीवन में उतरता है, तभी समाज उसका पालन करता है। धर्ममय जीवन ही सफलता एवं विजय श्री का वरण करता है। यथा : 'यतोधर्मस्ततोजय:। (महाभारतभीष्मपर्व)
अर्थात जहां धर्म है वहीं विजय है। धर्म ही विजय के मार्ग की ओर ले जाता है। जबकि अधर्म हमें पराजय एवं पतन की ओर ढकेलता है। धर्म की सामर्थ्य एवं महत्ता का प्रतिपादन करते हुए स्वयं भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं : यदायदाहि....युगेयुगे (गीता४/७-८) अर्थात् जब-जब धर्म की हानि होगी और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं प्रकट होता हूं। सज्जन मनुष्यों को दु:खों से मुक्त करने तथा दुष्टों का विनाश करने के लिए और धर्म की स्थापना करने के लिए मैं युग-युग में प्रकट होता हूं। धर्म जीवन जीने की कला है और इस कला को हम धर्म शास्त्रों से सीख सकते हैं। धर्म शास्त्रों में बहुत ही सहजता से जीवन के मूल्यों को धर्म के आचरण में शामिल कर दिया गया है। यही कारण है कि भारतीय धर्मशास्त्र केवल पूजा और श्रद्धा के लिए ही नहीं हैं अपितु उनका अध्ययन भी हमें सदैव करना चाहिए। ऋषि-मुनियों के हजारों वर्षों के कठोर तप एवं प्रयोग अनुसंधानो पर आधारित इन अनुभवसिद्ध धर्मशास्त्रों की सार्थकता भी है जब इनमें निहित गूढ़ ज्ञान को समझा एवं अपनाया जाए।
धर्म की प्रसिद्ध किताबों में धर्म के मायने
श्रीमद्भागवत : यह महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित है।इस ग्रंथ में 18 हजार श्लोक हैं।इस में भक्ति,वेदांत और योग कावि शदविवेचन सरल कथाओं के माध्यम से किया गया है।भक्ति मार्ग का यह प्रधान ग्रंथ है।श्रीमद्भागवत में धर्म को आचरण में लाने की शिक्षा देने की प्रेरणा देते हुए स्वयं भगवान कृष्ण कहते हैं मैं ही धर्म का उपदेश कहूँ।उपदेश के अनुसार स्वयं उसका आचरण करने वाला हूँ तथा उसका अनुष्ठान करने वालों का अनुमोदन करने वाला हूँ।मेरे आचरण से मनुष्य जाति को प्रेरणा मिले, इसलिए मैं स्वयं धर्म का आचरण करता हूँ।
महाभारत : यह ग्रंथ भी महर्षि वेदव्यास द्वारा लिखित है। एक लाख श्लोकों से बने हुए इस धर्म ग्रंथ में सनातन धर्म के आचार, दर्शन और इतिहास का समावेश है।इसे पंचम वेद भी कहा जाता है।महाभारत के संदर्भ में यह कथन प्रचलित है- 'यन्न भारते तन्न भारते, यानि जो महाभारत मे नहीं वह भारत में कहीं भी नहीं मिलेगा।धर्म को कैसे आचरण में लाएं यह शिक्षा हमें महाभारत से मिलती है।महाभारत के कथा प्रसंगों में जगह-जगह धर्ममय आचरण के उपदेश दिए गए हैं।धर्म का मर्म और उसकी व्यापकता पितामह भीष्मबताते हैं कि -
सर्वत्र विहितो धर्म: स्वग्र्य: सत्य फलं तप:। ,
बहादुरस्य धर्म स्यने हास्ति विफला क्रिया। (महाभारत शांतिपर्व 174/2)
यानि धर्म अदृश्य फल देने वाला होता है।जब हम धर्ममय आचरण करते हैं तो चाहे हमें उसका फल तत्काल न दिखाई दे किंतु समय आने पर उसका प्रभाव सामने आता ही है।सत्य (तप) को जानने का फल मृत्यु के पूर्व ही (ज्ञानकेरूपमें) मिलता है।
वाल्मीकि रामायण: - यह धर्मग्रंथ आदि कवि वाल्मीकि द्वारा रचित है। 24 हजार श्लोकों से निबद्ध इस ग्रंथ में भगवान राम के चरित्र का चित्रण हुआ है।वाल्मीकि रामायण की महत्वपूर्ण व्यवस्था इस का व्यापक सौंदर्य है।वाल्मीकि रामायण में भगवान श्री राम को धर्म का साक्षात विग्रह कहा गया है।श्री राम कभी धर्म को नहीं छोड़ते और धर्म उनसे कभी अलग नहीं होता है।श्री राम के अनुसार संसार में धर्म ही सर्वश्रेष्ठ है।धर्म में ही सत्य की प्रतिष्ठा है धर्म का पालन करने वाले को माता-पिता, ब्राह्मण एवं गुरु के वचनों का पालन करना चाहिए।यथा:यस्मिस्तु सर्वेस्वरसं निविष्टा धर्मों, यत: स्यात्तदुपक्रमेत।द्रेष्यो भवत्यर्थ परोहिलोके कामात्मता खल्व पिन प्रशस्ता।
यानि जिस कर्म में धर्म आदि पुरुषार्थों का समावेश नहीं, उसको नहीं करना चाहिए।जिस से धर्म की सिद्धि होती हो वहीं कार्य करें।जो केवल धन कमाने के लिए कार्य करता है, वह संसार में सबके द्वेष का पात्र बन जाता है।धर्म विरुद्ध कार्य करना घोर निंदनीय है।श्रीराम, जीवन का मूल उद्देश्य धर्म का पालन- केवल इस जन्म के लिए ही नहीं अपितु भविष्य के लिए भी आवश्यक मानते हैं।वन गमन से पूर्व वे माता कौशल्या से कहते हैं - यह जीवन अधिक समय तक रहने वाला नहीं है, इसके लिए मैं आज अधर्म पूर्वक इस तुच्छ पृथ्वी का राज्य लेना नहीं चाहता।इसी तरह उनकी पत्नी सीता भी धर्म के पालन को ही आवश्यक मानती है।
धर्मादर्थ: प्रभवतिधर्मात्प्रभवतेसुखम्।धर्मेणलभतेसर्वधर्मसारमिदंजगत्। (वाल्मीकिरामायण 3/9/30)
यानि धर्म से अर्थ प्राप्त होता है, धर्म से सुख मिलता है,और धर्म से ही मनुष्य सर्वस्व प्राप्त कर लेता है।इस संसार में धर्म ही सार है।देवी सीता ने यह उपदेश उस समय दिया जब वे वन में मुनि वेश धारण करनेके बावजूद शस्त्र साथ में रखना चाहते थे।वाल्मीकि रामायण में देवी सीता के माध्यम से पुत्रीधर्म, पत्नीधर्म और माताधर्म मुखरित हुआ।यही कारण है कि सीताजी भारतीय नारी का आदर्श स्वरूप हैं।सत्य,धैर्य,सदाचार,दया,तप आदि कौ वाल्मीकि रामायण में धर्म के अंग बताया गया है।
जिसका जीवन धर्ममय है वहीं अपने जीवन में अपार सुख व शांति पाता है ।
ReplyDelete✍सुनील शर्मा